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महत्वाकांक्षी पुरुकुल-मसूरी रोपवे परियोजना में लगेगा अभी और वक्त, इन बिंदुओ पर फंसा पेंच-

देहरादून के पुरकुल गांव से मसूरी लाइब्रेरी चौक तक साढ़े पांच किमी लंबी महत्वाकांक्षी रोपवे परियोजना के धरातल पर आकार लेने में अभी और वक्त लगना तय है. शासन ने रोपवे निर्माण की कार्यदायी संस्था तो तय कर दी है, लेकिन अब भी तीन बिंदुओं पर पेच फंसा है. जिसमे अपर व लोअर टर्मिनल के भूमि से जुड़े मामले क्लीयर कराने के साथ ही आइटीबीपी से अनुमति लेन शेष है. वहीं इसके बाद वन भूमि हस्तांतरण और पर्यावरणीय स्वीकृति से जुड़े मसलों का निराकरण होना भी बाकी है.

देहरादून: देहरादून के पुरकुल गांव से मसूरी लाइब्रेरी चौक तक साढ़े पांच किमी लंबी महत्वाकांक्षी रोपवे परियोजना के धरातल पर आकार लेने में अभी और वक्त लगना तय है. शासन ने रोपवे निर्माण की कार्यदायी संस्था तो तय कर दी है, लेकिन अब भी तीन बिंदुओं पर पेच फंसा है. जिसमे अपर व लोअर टर्मिनल के भूमि से जुड़े मामले क्लीयर कराने के साथ ही आइटीबीपी से अनुमति लेन शेष है. वहीं इसके बाद वन भूमि हस्तांतरण और पर्यावरणीय स्वीकृति से जुड़े मसलों का निराकरण होना भी बाकी है.

बता दें पिछले साल कैबिनेट ने देहरादून के पुरकुल गांव से मसूरी लाइब्रेरी चौक तक 300 करोड़ की साढ़े पांच किमी लंबी रोप-वे परियोजना को मंजूरी दी थी. ताकि रोप-वे परियोजना के धरातल पर आने से देहरादून-मसूरी हाइवे पर यातायात का दबाव कम होगा. साथ ही हवा में सैर का आकर्षण भी पर्यटकों को खींचेगा. इससे दून से मसूरी की दूरी करीब 15 मिनट में तय होगी. रोपवे में प्रतिदिन आठ से 11 हजार यात्री सफर कर सकेंगे. परियोजना में रोप-वे के अलावा मसूरी और पुरकुल गांव में मल्टीलेवल पार्किंग, फूड कोर्ट, पर्यटक सुविधा केंद्र भी बनने हैं. इसका जिम्मा फ्रांस की एक्सपर्ट कंपनी को दिया गया है. करीब तीन सौ करोड़ की इस परियोजना के लिए एग्रीमेंट हो चुका है, लेकिन अब भी कुछ मसलों को लेकर पेंच फंसा हैं.

सचिव पर्यटन दिलीप जावलकर के अनुसार रोपवे का एलाइनमेंट आइटीबीपी परिसर से होकर गुजरेगा. ऐसे में आइटीबीपी की अनुमति ली जानी है. इसके अलावा मसूरी में अपर टर्मिनल वाली भूमि से अतिक्रमण हटाया जाना है. लोअर टर्मिनल यानी पुरकुल में रोपवे क्षेत्र में निजी भूमि भी आ रही है, जिस पर निजी भूमि स्वामी को एक कोने में भूमि दी जानी है. उन्होंने बताया कि इन तीनों मसलों का निस्तारण करने के पश्चात कार्यदायी एजेंसी को दिया जाना है. इसके बाद वन भूमि और पर्यावरणीय स्वीकृति से जुड़े कार्य होने हैं. इन सभी में चार से पांच माह का वक्त लग सकता है. इसके बाद निर्माण कार्य शुरू होगा.

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