अर्थव्यवस्थाविशेषसंपादक की कलम से

संपादक की कलम से: मंहगाई चरम पर, जनता त्रस्त, सत्ता पक्ष मस्त और विपक्ष पस्त, चौंका रही ये स्थिति

महंगाई का निरंतर बढ़ना गरीब और विकासशील देशों के लिए उस दुःस्वप्न की तरह होता है जिससे पीछा छुड़ाने के सारे प्रयास व्यर्थ साबित होते हैं। कभी मंदी की वजह से महंगाई तो फिर कभी तेजी की वजह से कीमतों में बढोत्तरी। भारतीय अर्थव्यवस्था के वैश्विक अर्थजगत से जुड़ने के पश्चात महंगाई को नियंत्रित करने के सारे उपाय असफल सिद्ध हो जाते हैं। वहीं एक दौर में जनता के लिए महंगाई  बड़ा मुद्दा होता था, लेकिन अब  महंगाई के खिलाफ जनता के भी विरोध के दबे सुर ही सुनाई पड़ते हैं, जिसका नतीजा ये है कि सत्तासीन  मस्त हैं और आमजन बेहाल है। महंगाई के खिलाफ जन आन्दोलन होता तो सरकार की चूल्हे भी हिलती और वह महंगाई पर नियंत्रण को लेकर कोई ठोस कदम उठाती। वैश्विक पूंजी बाजार, वैश्विक स्तर पर जिंसों की कीमतों में बढ़ोतरी, सकल घरेलू उत्पाद में उच्च वृद्धि के कारण घरेलू मांग में उछाल और खराब मानसून के कारण फसलों में नुकसान जैसे कारणों की आड़ में महंगाई की बढ़ती हुई दर को रोकने के लिए योजना बनाने वाले सुकून से बैठे हैं। महंगाई की ऊंची दर के खिलाफ धरना-प्रदर्शन, राजनीतिक बहस और मीडिया रिपोर्ट का धीरे-धीरे बंद होना चौंकाता है। लोगों की पीड़ा को सही तरीके से नहीं समझा जा रहा है। सरकार का इस मामले में खास तव्वजो न देना जता रहा है कि महंगाई के दर्द से कराह रहे राष्ट्र का दर्द पूरी शिद्दत से महसूस नहीं किया जा रहा है। यहां तक कि एक खास तबका बढ़ती महंगाई को जायज ठहरा रहा है। आम आदमी के अहम मुद्दे को दरकिनार किया जा रहा है।

आज कोरोना महामारी  के बीच एक ओर जनता पहले ही कठिनाईयों का सामना कर रही है, तो दूसरी ओर लगातार बढती महंगाई ने आम नागरिक की परेशानी को और बढ़ा दिया है। ताज्जुब की बात है कि देश में  मंहगाई  लगातार बढ़ रही है, डीजल पेट्रोल व खाद्य  पदार्थों के दाम लागातार आसमान छू रहे हैं, आमजन परेशान है, लेकिन महंगाई के खिलाफ जिस  व्यापक जनांदोलन की दरकार है, उसकी सुगबुगाहट तक नही। जो कि आने वाले समय के लिए अच्छा संकेत नही है। विपक्ष बिखरा हुआ है, हालाँकि उसके द्वारा कई बार सरकार पर दबाव के लिए प्रयास जरूर किये गये, लेकिन विपक्ष का  विरोध जनांदोलन का रूप लेने में नाकाम ही रहा ।

बहरहाल कांग्रेस पार्टी जरूर पुरजोर तरीके से महंगाई के खिलाफ मोर्चे पर डटी है और सरकार पर हमलावर है ,लेकिन उसका विरोध  अभी तक सरकार पर बेअसर रहा है । देश के भीतर विपक्ष इतना कमजोर हो चुका कि सत्ता के गलियारों में विरोध के स्वर दब कर रह  गये। इसका कारण है कि बढती महंगाई को लेकर सत्ता पक्ष को घेरने से पहले विपक्ष एकजुट नही हो पाटा और उसे अपेक्षित जन सहयोग नही मिल पाता है। मतलब इतना अहम मुद्दा फिर भी विपक्ष जनता का विश्वास जीतने में कामयाब नही हो पाया है। जनता जिस मंहगाई की मार झेल रही है, उसके लिए वह खुद भी जिम्मेदार है। क्योंकि वह अंदर ही अंदर महंगाई के बोझ तले घुट तो रही है, लेकिन मंहगाई पर नियंत्रण को लेकर सरकार पर दबाव बनाया जा सके, इसके लिए आगे तैयार नही है। नतीजा महंगाई चरम पर है, सत्ता पक्ष मस्त है, और विपक्ष पस्त है।

माना कि महंगाई और कीमतों में वृद्धि का मसला अंतरराष्ट्रीय हालातों से डील होता है। फिर भी रिजर्व बैंक सहित सरकार को स्थिति पर नजर रखते हुए एक वाजिब कीमत को बनाए रखने की कोशिश करनी होगी ताकि कीमतों में भारी बढोत्तरी से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले अल्प आय वर्ग को राहत प्रदान किया जा सके। अगर महंगाई पर तत्काल प्रभाव से अवरोध नहीं लगाया गया तो अर्थव्यवस्था को गंभीर नतीजे भुगतने होंगे। इससे एक खराब चक्र को बल मिलेगा। मजदूरी और लागत में वृद्धि एक बार फिर कीमतों में बढ़ोतरी कर देगी। इससे जरूरी वस्तुओं की कीमतों में और वृद्धि होगी। इस कुचक्र से अर्थव्यवस्था से जुड़ी कई चीजों को धक्का लग सकता है। बिना जरूरी उपाय किए उम्मीदें पालते रहना अप्रत्याशित नतीजों का कारण बन सकता है।

भगवान सिंह चौहान(संपादक)

Tags
Close